36 - ज़िन्दगी तुझे ज़िन्दगी जीना सिखा रहे हैं

एलिम्को में नियमित रूप से जाना हो रहा था. चलने का अभ्यास पहले की तुलना में कुछ बेहतर होने लगा था. अब कृत्रिम पैर को बाँधने में पहले जैसी उलझन नहीं होती थी. कृत्रिम पैर पहनने के पहले बाँयी जाँघ पर पाउडर लगाया जाता, उसके ऊपर एक कपड़े की पट्टी पहननी होती थी उसके बाद कृत्रिम पैर को पहनना होता था. फाइबर की कैप बनी होती थी जिसमें बाँयी जाँघ अन्दर जाती थी. इसी फाइबर कैप से चमड़े की बेल्ट बंधी होती थी, जिसे कमर के चारों तरफ लपेट लिया जाता था. इसके सहारे कृत्रिम पैर को बाँयी जाँघ से अलग होने से रोका जाता था.


वातावरण में गर्मी होना शुरू हो चुकी थी. हमें वैसे भी गर्मी बहुत ज्यादा लगती है. अब आप लोगों को शायद इस पर विश्वास न हो मगर सत्य यह है कि हमें इतनी गर्मी लगती है कि सर्दियों में गरम कपड़े पहनने की आवश्यकता महसूस नहीं होती है. याद नहीं कि सर्दी से बचने के लिए गरम कपड़े अंतिम बार कब पहने थे. शौकिया पहन लिए जाते हैं, कई बार बड़ों की डांट से बचने के लिए. बहरहाल, गर्मी ज्यादा लगना एक समस्या तो है ही, साथ ही ज्यादा पसीना आना भी एक और समस्या है. इन दो समस्याओं के कारण बाँयी जाँघ की पट्टी बहुत जल्दी पसीने से भीग जाती. गर्मी के कारण कई बार छोटी-छोटी फुंसियाँ भी बाँयी जाँघ पर निकल आतीं. दाहिने पंजे, घुटने का दर्द अपनी करामात तो दिखा ही रहा था, ये समस्या भी परेशान करने लगी.


इसके बाद भी ज्यादा से ज्यादा अभ्यास करने की जिद इसी कारण बनी हुई थी कि जल्द से जल्द एलिम्को से जाना है. जल्द से जल्द अपने पैरों पर चलना है. दर्द, परेशानी एलिम्को में आये अन्य दूसरे मरीजों को देखकर भी दूर हो जाती या कहें कि उस तरफ से ध्यान हट जाता. उनको देखकर लगता कि इनसे कम समस्या है हमें. एलिम्को आने वाले तमाम मरीजों में एक मरीज को देखकर मन बहुत द्रवित हुआ था.

एक दिन हम लोग जब एलिम्को पहुँचे तो एक व्यक्ति बहुत छोटी बच्ची को लिए वहाँ हॉल में बैठा हुआ था. हमने पहुँच कर पैर पहनने की अपनी प्रक्रिया शुरू कर दी, उनकी तरफ बहुत ध्यान नहीं दिया. वहाँ एक-दो मुलाकातों तक तो किसी तरह की औपचारिकता का निर्वहन भी नहीं हो पाता था. दो-चार दिन लगातार मिलते-देखते रहने के कारण कुछ लोगों से हँसना-बोलना, नमस्कार आदि होने लग जाती थी. उस व्यक्ति को पहली बार देखा था तो स्वाभाविक तौर पर उसकी तरफ विशेष ध्यान न देकर अपने काम में लग गए.

लगभग आधा घंटे बाद एलिम्को के एक कर्मी को अपने हाथ में बहुत छोटा सा कृत्रिम पैर लिए आते देखा तो एकदम से उस व्यक्ति और उसके साथ की बच्ची की तरफ ध्यान चला गया. अपना चलना भूल हम दोनों तरफ की रॉड पकड़े वहीं खड़े रह गए. एलिम्को कर्मी के हाथ में उसी बच्ची के लिए कृत्रिम पैर था. पाँच-छह वर्ष की उस बच्ची का घुटने के नीचे से उसका एक पैर अलग हो गया था दूसरा पैर एकदम सही था. कुछ देर की पैर लगाने की प्रक्रिया के बाद वह बच्ची अपने पैरों पर खड़ी हुई. अपने पिता का हाथ पकड़, रुक-रुक कर चलना भी शुरू किया. उस समय उस बच्ची के चेहरे की ख़ुशी और उसके पिता की आँखों से छलकते स्नेह को लिखना संभव नहीं.

अपनी अवस्था के अनुसार छह-आठ महीने में पैर बदलवाने के लिए उस बच्ची को एलिम्को आना पड़ेगा. उस नन्हीं सी बच्ची की परेशानी, उसके दर्द का अनुभव करते ही एक झटके में दाहिने पैर का दर्द, बाँयी जाँघ की समस्या जैसे गायब हो गए. कुछ देर तक उसे चलने का अभ्यास करवाया गया. हर बार वह बच्ची मुस्कुराते हुए अपना अभ्यास सहजता से करती रही. अपने आपको पुरानी अवस्था में देखकर, चलता देखकर वह अवश्य ही प्रसन्न हो रही थी.

हमारे मन में अपनी और उसकी अवस्था का एकसाथ स्वरूप खड़ा हुआ तो लगा कि हमने तो फिर भी बिना इस कृत्रिम पैर के तीस वर्ष की आयु तक का स्वतंत्र आनंद, सुख उठा लिया मगर ये बच्ची तो इतनी से कम आयु में एक परेशानी, कष्ट को लेकर आगे बढ़ेगी. सिर को झटक कर सोच-विचार की श्रृंखला को तोड़ते हुए, अपने सारे दर्द भुलाते हुए चलने के अभ्यास में जुट गए.

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ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद @ कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

2 comments:

  1. जिंदगी का दम इसी हौसले से है ।

    - रेखा

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  2. सचमुच दुनिया में कितना दुख है। जब दूसरों की तकलीफ़ देखें तो अपना कम लगता है। शुभकामनाएँ।

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39 - ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से जीतने की कोशिश में

पैर लगने का सुख भी था और साथ ही यह संतोष भी कि अब एलिम्को तक की भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी. अपने नए साथियों (कृत्रिम पैर और छड़ी) के साथ जीवन क...