33 - अब प्रतीक्षा अपने दोनों पैरों पर चलने की

नमस्कार मित्रो, इधर आपसे बातचीत किये लम्बा समय हो गया. दुर्घटना के बाद से आप सभी के स्नेह के साथ चलते हुए एलिम्को तक पहुँच गए थे. वहाँ डॉक्टर ने पैर की, उस पर आई नई त्वचा की स्थिति देखकर पैर बनाने से इंकार कर दिया. यह इंकार स्थायी या दीर्घकालिक नहीं था बल्कि कुछ दिनों के लिए ही था. उनकी तरफ से आश्वासन मिला था कि पैर बन जायेगा, बस पैरों की स्थिति और बेहतर हो जाये. उस समय वापस घर लौट आये थे, कुछ आशा और कुछ निराशा लेकर.


आशा-निराशा के उन तमाम भावों को लेकर आना तो हो गया मगर समय ऊहापोह में निकल रहा था. यह ऊहापोह खुद की मानसिकता को लेकर था. अभी तक खुद के खड़े हो पाने को लेकर विचार बनते-बिगड़ते रहते थे. अब दिमागी उठापटक चल रही थी कि कृत्रिम पैर के साथ चलना हो पायेगा या नहीं? ऐसा अपने दाहिने पैर के कारण लग रहा था. घर पर किये जा रहे व्यायाम के दौरान दाहिने पैर के सहारे खड़े होने की कोशिश की जाती है, कुछ-कुछ मिनट तक खड़े रहने का अभ्यास किया जाता. इस अभ्यास के दौरान पंजे में भयंकर दर्द होता. कई-कई बार लगता कि यह दर्द कभी चलने न देगा, एक कदम आगे न बढ़ने देगा, अपने पैरों पर फिर न खड़े होने देगा.



फिर वह दिन भी आ गया जब हम एलिम्को जाने के लिए फिर तैयार हुए. पहली बार एलिम्को जाने में कोई संदेह नहीं था क्योंकि हम अपनी स्थिति को बेहतर मान रहे थे मगर अबकी, दोबारा एलिम्को जाते समय मन में एक संदेह उपज रहा था. एक डर लग रहा था कि कहीं इस बार भी डॉक्टर बैरंग न लौटा दे. एलिम्को पहुँचने के बाद डॉक्टर द्वारा उसी तरह से गहन जाँच की गई और उनकी संतुष्टि के बाद हम सबके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई.

एलिम्को की अपनी प्रक्रिया द्वारा पैर की नाप ली गई. हमारी पूरी लम्बाई को जाँचा-परखा गया. पट्टियों, प्लास्टिक ऑफ़ पेरिस आदि की सहायता से बाँयी जाँघ की नाप ली गई. यह सब जाँघ का साँचा बनाये जाने के लिए किया जा रहा था. इसी साँचे के द्वारा फाइबर की एक कैप बनाई जाती है. इसे पैर के उस भाग पर पहन लिया जाता है. फाइबर के इसी हिस्से से घुटने के नीचे वाला पैर का कृत्रिम हिस्सा जुड़ा होता है. इसी जगह पर एक लॉक भी लगा होता है, जिसकी सहायता से पैर को मोड़ सकते हैं, सीधा रख सकते हैं.

पैर की नाप ले ली गई थी मगर अभी भी इंतजार करना था. पहले इंतजार किया पैर की नाप के लिए, अब इंतजार करना था पैर के बन जाने का. एलिम्को में कृत्रिम हाथ, पैरों की तथा अन्य सहायक उपकरणों की जिस तरह से माँग है उसे देखते हुए वहाँ समय लगता है. उनकी तरफ से जगहों-जगहों पर दिव्यांगजनों के वितरण हेतु कैम्पों का आयोजन होता रहता है. इसके चलते भी वहाँ व्यस्तता बनी रहती है.

पैर का नाप देने और आगे की स्थिति से परिचित होने के बाद हम लोग फिर घर वापस लौट आये. मन में सुकून था कि अबकी जब एलिम्को जाना होगा तो पैर लेने के लिए जाना होगा. अब भले एक पैर के सहारे जायेंगे मगर वापसी दोनों पैरों से करेंगे. तमाम दुखों के बीच से ख़ुशी की एक लहर उठती देख कर मन प्रसन्न हो रहा था. इसके अलावा प्रसन्नता परिजनों की ख़ुशी देखकर भी हो रही थी, जिनके लिए हमारे चलने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हमारा जीवित रहना था. सभी के साथ हँसी-ख़ुशी से दिनों को बिताते हुए उस दिन का इंतजार करने लगे जबकि हम दो पैरों पर चलने के लिए एलिम्को जायेंगे.

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ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद @ कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र

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